- प्रतापनगर के शुक्री गांव के युवा पर्वतारोही ने बढ़ाया उत्तराखंड का मान; नेहरू पर्वतारोहण संस्थान से लिया प्रशिक्षण, मुख्यमंत्री भी कर चुके हैं सम्मानित
- पहाड़ों से इश्क, शिखर तक पहुंचने का जुनून; सार्थक की सफलता से टिहरी गौरवान्वित
टिहरी गढ़वाल, 30 अक्टूबर। पहाड़ों की दुर्गम चोटियों को देखकर जहां कई लोग उनकी विशालता और कठिनाइयों का अंदाजा लगाते हैं, वहीं कुछ युवा इन्हीं चोटियों को अपने सपनों की मंजिल बना लेते हैं। टिहरी गढ़वाल के सार्थक कुड़ियाल ऐसे ही जुनूनी युवाओं में शामिल हैं, जिन्होंने अपने साहस, दृढ़ संकल्प और अथक मेहनत के दम पर हिमालय की चुनौतीपूर्ण श्रीकंठ चोटी का सफल आरोहण किया है।
समुद्र तल से 6,137 मीटर की ऊंचाई पर स्थित श्रीकंठ चोटी पर पहुंचकर सार्थक ने पर्वतारोहण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की। उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, इस सफलता के साथ वह दुनिया के सबसे युवा श्रीकंठ पर्वतारोही बने हैं। उनकी इस उपलब्धि से टिहरी गढ़वाल सहित पूरे उत्तराखंड का गौरव बढ़ा है।
शुक्री गांव से शुरू हुआ पहाड़ों की चोटियों तक पहुंचने का सफर
सार्थक कुड़ियाल मूल रूप से टिहरी जिले के प्रतापनगर विकासखंड के शुक्री गांव के निवासी हैं। उनका जन्म अगस्त 2001 में नई टिहरी में हुआ। उनके पिता रमेश कुड़ियाल पत्रकार हैं, जबकि माता सरिता कुड़ियाल समाजसेवा के क्षेत्र से जुड़ी हैं। उनकी माता भारत सरकार की महत्वपूर्ण परियोजना महिला समाख्या में जिला समन्वयक के पद पर भी कार्य कर चुकी हैं।
सार्थक की प्रारंभिक शिक्षा ऑल सेंट्स कॉन्वेंट स्कूल और केंद्रीय विद्यालय, नई टिहरी में हुई। इसके बाद उन्होंने देहरादून में आगे की पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान ही प्रकृति और पहाड़ों के प्रति उनका आकर्षण बढ़ता गया। यही आकर्षण धीरे-धीरे उनके जीवन का लक्ष्य बना और पर्वतारोहण उनका जुनून बन गया।
कठिन प्रशिक्षण से मजबूत किया पर्वतारोहण का हुनर
पर्वतारोहण केवल ऊंची चोटियों तक पहुंचने का साहस नहीं, बल्कि शारीरिक क्षमता, मानसिक दृढ़ता, अनुशासन और विपरीत परिस्थितियों में सही निर्णय लेने की कला भी है। सार्थक ने इस चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में अपनी दक्षता बढ़ाने के लिए व्यवस्थित प्रशिक्षण हासिल किया।
उन्होंने उत्तरकाशी स्थित नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम) से बेसिक माउंटेनियरिंग कोर्स, सर्च एंड रेस्क्यू कोर्स तथा एमओआई कोर्स पूरा किया। इसके अलावा मनाली स्थित अभिमास (ABHIMAS) से एडवांस माउंटेनियरिंग कोर्स भी किया।
निरंतर अभ्यास और तकनीकी प्रशिक्षण के जरिए उन्होंने पर्वतारोहण की बारीकियां सीखीं और चुनौतीपूर्ण पर्वतीय परिस्थितियों में अपने अनुभव को मजबूत किया। इसी तैयारी ने उन्हें श्रीकंठ जैसी कठिन चोटी के अभियान के लिए सक्षम बनाया।
श्रीकंठ चोटी पर हर कदम पर चुनौती
6,137 मीटर ऊंची श्रीकंठ चोटी का आरोहण पर्वतारोहियों के लिए एक कठिन चुनौती माना जाता है। अधिक ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी, खड़ी ढलानें और तेजी से बदलता मौसम पर्वतारोहियों की शारीरिक क्षमता के साथ उनके धैर्य और निर्णय लेने की क्षमता की भी परीक्षा लेते हैं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अब तक केवल चार पर्वतारोहण दल इस चोटी का सफलतापूर्वक आरोहण कर पाए हैं। ऐसे में सार्थक की उपलब्धि पर्वतारोहण के क्षेत्र में खास महत्व रखती है।
उत्तराखंड सरकार की ओर से वर्ष 2022-23 में प्रायोजित श्रीकंठ चोटी पर्वतारोहण अभियान के लिए भी सार्थक का चयन हुआ था। अभियान में सफलता के बाद उन्हें मुख्यमंत्री द्वारा सम्मानित किया गया था।
‘पहाड़ मेरे लिए केवल पहाड़ नहीं, मेरा जीवन हैं’
सार्थक के लिए पर्वतारोहण केवल किसी चोटी को फतह करने का रोमांच नहीं है, बल्कि प्रकृति को करीब से समझने और मानव जीवन के साथ उसके गहरे संबंध को महसूस करने का माध्यम भी है। पर्वतारोहण के साथ उन्होंने जल क्रीड़ा के क्षेत्र में भी प्रशिक्षण प्राप्त किया है।
सार्थक कहते हैं, “पहाड़ मेरे लिए केवल पहाड़ नहीं हैं, बल्कि मेरा जीवन हैं। मैं हर ऊंचे से ऊंचे पहाड़ की चोटी पर पहुंचकर एक और पहाड़ देखना चाहता हूं। मेरे लिए पर्वतारोहण किसी चोटी को फतह करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पहाड़ों के विस्तार, प्रकृति में उनके महत्व और मानव जीवन के साथ उनके अंतरसंबंध को समझने का एक माध्यम है। किसी ऊंची चोटी पर पहुंचकर दुनिया को देखने का नजरिया ही बदल जाता है।”
उनके विचार बताते हैं कि पहाड़ों के प्रति उनका लगाव केवल रोमांच तक सीमित नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और उसके संरक्षण की भावना से भी जुड़ा है।
युवाओं के लिए प्रेरणा बने सार्थक, टिहरी का बढ़ाया मान
सार्थक कुड़ियाल की सफलता उन युवाओं के लिए प्रेरणादायक है, जो अपने सपनों को हकीकत में बदलना चाहते हैं। उनकी उपलब्धि बताती है कि स्पष्ट लक्ष्य, निरंतर अभ्यास, अनुशासन और दृढ़ इच्छाशक्ति के सहारे कठिन से कठिन मंजिल तक पहुंचा जा सकता है।
श्रीकंठ चोटी का सफल आरोहण सार्थक के लिए अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि हिमालय की अन्य ऊंचाइयों की ओर बढ़ते सफर का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। टिहरी की धरती से निकलकर हिमालय की दुर्गम चोटियों तक पहुंचने वाले सार्थक आज अपने जुनून और मेहनत के दम पर नई पीढ़ी के लिए मिसाल बन रहे हैं।
उनकी कहानी संदेश देती है कि सपने चाहे कितने ही ऊंचे क्यों न हों, उन्हें पूरा करने के लिए साहस, धैर्य और निरंतर प्रयास जरूरी हैं। पहाड़ों से प्रेम करने वाले सार्थक ने अपनी उपलब्धि से साबित किया है कि जब जुनून लक्ष्य बन जाए, तो शिखर तक पहुंचने का रास्ता भी निकल आता है।


